आंग्ल नववर्ष के स्वागत के लिए पूरा देश बेताब है। युवाओं में अंग्रेजी नववर्ष के स्वागत की बेकरारी कुछ ज्यादा है। 2017 को भावभीनी विदाई देने और 2018 को गले लगाने की तैयारियां भी पूरे शवाब पर हैं। ठंड और कोहरा जरुर लोगों के रंग में भंग डाल रहा है। ऐसा ही चलता रहा तो क्या होगा, यह चिंता हर आम और खास की जुबान पर है। एक साल पहले 2017 भी अतिथि थी लेकिन अब उसकी स्थिति अतिथि और मेजबान के बीच की है। न तो वह अतिथि है और न ही मेजबान। उसे विदाई दी जानी है। उसे नए साल का स्वागत भी करना है और अपना उत्तराधिकार भी सौंपना है और इसके बाद खुद नेपथ्य में चले जाना है। लोग प्रसंगवश उसे याद भी करेंगे लेकिन वर्तमान और अतीत के फर्क को तो 2017 भी समझता है। वह यह भी जानता है कि अब उसमें पहले जैसा आकर्षण नहीं बचा। लोगों की अब उसमें रुचि ही नहीं बची। दिसंबर के पहले ही दिन से वह इस बात को शिद्दत के साथ महसूस कर रहा है।

उत्तर प्रदेश को लेकर उसका नजरिया बेहद साफ है। 2017 वह साल है जिसने उत्तर प्रदेश की दशा और दिशा बदली है। उसने उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन जैसा बड़ा काम किया है। ‘काम बोलता है’ जैसे नारे लगाने वालों को राजनीतिक शिकस्त दी है। उन्हें यह बताया है कि ‘व्यक्ति नहीं, समय बलवान होता है।’ समय खराब होता है तो अपने भी पराए हो जाते हैं। गैर भी अपने हो जाते हैं। ‘गरल सुधा रिपु करय मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई’ वाली चौपाई तो सभी ने सुनी है। अखिलेश यादव को ही देख लीजिए वे 2017 में सपा के सर्वेसर्वा तो हो गए लेकिन अपनों से कट गए। जड़ से कटने पर पेड़ ठूंठ हो जाता है। अखिलेश यादव भी ठूंठ हो गए हैं। सत्ताच्युत होना ठूंठ होने जैसा ही है। मुलायम सिंह का आशीर्वाद मिल तो गया है लेकिन पुत्र के नाते लेकिन जिस तरह मुलायम सिंह यादव उनके प्रयासों की विफलता के दावे करते रहते हैं, उसे बहुत अच्छा तो नहीं कहा जाएगा।

गुजरात में राहुल गांधी के पंजे को मजबूती देने के लिए अखिलेश यादव ने पांच विधानसभा क्षेत्रों में अपनी साइकिल उतार दी। मुलायम सिंह यादव ने कहा कि गुजरात में अखिलेश का एक भी प्रत्याशी नहीं जीतेगा और वही हुआ भी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद अखिलेश यादव को भरोसा था कि उत्तर प्रदेश के शहरों में सपा की सरकार बनेगी लेकिन वहां भी उनकी दाल नहीं गली। योगी आदित्यनाथ और महेंद्रनाथ पांडेय की कुशल रणनीति ने उनकी साइकिलों की हवा निकाल दी। हैंडिल उखाड़ दी। पुर्जे-पुर्जे अलग कर दिए। सपा के गढ़ इटावा, सैफई, कन्नौज और आजमगढ़ में पार्टी को पराजय का स्वाद चखना पड़ा। मायावती के हाथी ने मेरठ और अलीगढ़ नगरनिगम में जरूर अपनी मस्त चाल दिखाई। बाकी नगर निगमों में वह कमल के फूल को उखाड़ना तो दूर उसके पास भी नहीं फटक सका। सपा और बसपा दोनों ही ने ईवीएम पर अपनी हार का ठीकरा फोड़ा।

विधानसभा चुनाव में भी और नगर निकाय के चुनाव में भी। इन दोनों दलों को आज भी इस बात का मुगालता है कि अगर बैलेट बाॅक्स से चुनाव होंगे तो भाजपा हार जाएगी। इसका आधार क्या है, ये तो वही जाने, लेकिन 2017 में ईवीएम पहले दिन से ही चर्चा के केंद्र में रही। 2017 में राजनीति के धुर विरोधी रहे राहुल और अखिलेश एक हुए। उन्होंने एक साथ मंच भी साझा किया और रैली भी निकाली। दो युवकों की इस जोड़ी ने भाजपा को अंदर तक हिलाया भी और परेशान भी किया लेकिन महत्वाकांक्षाओं और साझ में बूझ को महत्व देने की वजह से यह जोड़ी भाजपा नेतृत्व को उस तरह जवाब नहीं दे पाई जिसकी कि उम्मीद थी। विधानसभा चुनाव के दौरान बुआ और भतीजे में सियासी नोक-झोंक भी चर्चा के केंद्र में रही। यूं तो संबंधों के संबोधन को लेकर तुनकमिजाजी भी पूरे साल बनी रही। मायावती को कभी भी यह अच्छा नहीं लगा कि मुलायम का बबुआ उन्हें बुआ कहे लेकिन अखिलेश उन्हें बुआ ही कहते रहे। चाचा शिवपाल के विरोध ने जहां उन्हें अंदर तक हिलाया, वहीं रामगोपाल यादव के स्नेहिल हाथों ने उन्हें दुलारा भी और सपा की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचाया भी।

राहुल गांधी के लिए भी वर्ष 2017 झटका देने वाला साबित हुआ। पंजाब को छोड़कर उनकी पार्टी कहीं भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई। उत्तर प्रदेश में उन्होंने पीके पर भरोसा किया लेकिन पीके की रणनीति भी उन्हें खास मुकाम नहीं दिला सकी। यह वही पीके थे जिन्होंने बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव के गठबंधन को भाजपा पर जीत दिलाई थी लेकिन उत्तर प्रदेश में गठबंधन के बाद भी वे मतदाताओं को सपा-कांग्रेस गठबंधन से जोड़ नहीं पाए। नगर निकाय चुनाव में तो अमेठी की निकाय सीट भी कांग्रेस के पास नहीं रही।

वर्ष 2017 बसपा के लिए भी बहुत सुखद नहीं रहा। टिकटों के वितरण संबंधी विवाद में स्वामी प्रसाद मौर्य सरीखे कई कद्दावर सिपहसालार भी उसके खेमे से निकल गए। उन्होंने बसपा प्रमुख की दलित की बेटी वाली छवि को भी प्रभावित किया। उन्हें दौलत की बेटी कहा। 2017 के प्रारंभ में ही यह सिलसिला आरंभ हो गया था। बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने से बसपा को काफी धक्का लगा। किसी ने भाजपा का दामन थामा तो किसी ने सपा का। भाजपा पहुंचे बसपाई तो मौज में रहे लेकिन सपा पहुंचे बसपाइयों के सामने सूखे जैसे ही हालात हैं।

भाजपा नेता दयाशंकर सिंह की आपत्ति के बाद बसपाइयों ने नसीमुृद्दीन सिद्दीकी के नेतृत्व में उनकी बहन बेटी के लिए जो अपशब्द कहे,उसका विरोध कर स्वाति सिंह राजनीति में छा गई। उन्हें राज्यमंत्री का रुतबा मिल गया। उनके भाजपा से निष्कासित पति फिर भाजपा में ससम्मान वापस हो गए। मतलब आम के आम, गुठलियों के दाम जबकि नसीमुद्दीन पर मुकदमा चल रहा है। नोटिसें मिल रही हैं। मायावती भाग्यशाली निकलीं कि जांच में उनका नाम जीडी से बाहर हो गया। 2017 में उत्तर प्रदेश में परिवारवाद की राजनीति खूब फली-फूली। मुलायम की जगह अखिलेश और सोनिया गांधी की जगह राहुल का पार्टी अध्यक्ष बनना इसका इंगित तो है ही। परिवारवाद की मुखालफत करने वाली मायावती भी अपने भाई आनंद कुमार को बसपा में ले आईं। उन्होंने उन्हें उपाध्यक्ष भी बना दिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने संगठित अपराध में लिप्त लोगों पर नियंत्रण के लिए यूपीकोका जैसा विधेयक विधानसभा में पास कराया। मदरसों के लिए विशेष पोर्टल बनवाया। उनका पंजीकरण सुनिश्चित कराया। अयोध्या में बड़े पैमाने पर दीपोत्सव का आयोजन कर उन्होंने हिंदुत्व के विस्तार-विचार का संकेत दे दिया। अर्ध कुंभ को कुंभ करार देकर उन्होंने प्रदेश में बड़ी बहस का मंच प्रदान किया। सपा नेताओं ने तो भाजपा के लोगों को नकली हिंदू और सपा के लोगों को असली हिंदू करार दिया। वर्ष 2017 में भाजपा को कदम-कदम पर विपक्ष के विरोध का सामना करना पड़ा। चुनाव के दौरान अनेक बार भाषिक मर्यादाएं भी टूटीं। उसकी आलोचना भी हुईं। वर्ष 2017 में मुलायम और मोदी की मुलाकात और उनकी कानाफूंसी भी चर्चा के केंद्र में रहीं। इसे लेकर लंबे समय तक कयासों का बाजार गर्म रहा। मुलायम सिंह यादव ने योगी आदित्यनाथ के शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री के कान में क्या कहा, यह आज भी सवाल है। सवाल का जवाब वर्ष 2017 नहीं तलाश सका। किसानों के लिए यह साल बहुत अच्छा रहा। सरकार ने उनके 36 हजार करोड़ के कर्ज को माफ कर दिया। अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के लिए यह साल भारी रहा। गायत्री प्रजापति को जेल की हवा खानी पड़ी। चिकित्सा के मायने में गोरखपुर के मेडिकल काॅलेज और केजीएमयू की घटनाएं झकझोरने वाली रहीं। बीएचयू में भी हालात तनाव के बने लेकिन सरकार के स्तर पर जिस तरह मामले को संभाला गया। इस बावत एक्शन लिए गए, उसकी जितनी भी सराहना की जाए, कम है। तीन तलाक का मुद्दा पूरे साल छाया रहा और जाते-जाते मुस्लिम महिलाओं को अपने अधिकारों की रक्षा की अनुभूति करा गया।

कुल मिलाकर वर्ष 2017 उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए खट्टे-मीठे अनुभवों वाला रहा लेकिन इस साल उत्तर प्रदेश के विकास को प्राथमिकता भी मिली। रतन टाटा जैसे उद्योगपतियों ने भी उत्तर प्रदेश सरकार की काम करने वाली मानसिकता समझी। जिस टीसीएस को हटाने की वे बात कर रहे थे। अब वे उसके विस्तार पर आमादा हैं। वाराणसी में भी कैंसर पीड़ितों के लिए इंस्टीट्यूट खोलने पर उनका जोर है। उत्तर प्रदेश में चहुंओर विकास का माहौल बना है। अपराध नियंत्रण को लेकर सरकार की गंभीरता के बाद भी अपराधों का होना चिंताजनक तो है ही लेकिन यह साल इस प्रदेश को एक अनुभवी डीजीपी तय करता जाएगा, इसकी अपेक्षा तो है ही।

अब उत्तर प्रदेश को नए साल से विशेष उम्मीदे हैं। लेकिन समझना यह होगा कि नया हमेशा क्षणिक होता है। कुछ समय विशेष का होता है। हर क्षण, हर पल नया होता है। हर सांस, हर उच्छ्वास नई होती है। हर दिन, हर रात नई होती है। नदी की हर लहर नई होती है। जब प्रकृति में सब कुछ नया होता है तो जीवन में कुछ भी पुराना कैसे हो सकता है। वर्तमान हमें प्रेरणा देता है कि हर क्षण कीमती है। उसका सदुपयोग करना ही व्यक्तित्व की पुरुषार्थ की कसौटी है। नए साल में कुछ खास तब होगा जब इस प्रदेश का हर व्यक्ति वर्तमान की कीमत समझे। उसका यथेष्ठ उपयोग करे। वर्तमान को खोकर अतीत और भविष्य पर बहस प्रासंगिक नहीं है। नया साल काम करने की, अभिनव विकास की प्रेरणा देता है। योगी सरकार इसे निधि समझकर जनहित में अपना शत प्रतिशत योगदान देगी, यही आम जन की अपेक्षा भी है लेकिन यह समय सरकार के भरोसे ही बैठने का नहीं है, खुद भी उठने और आगे बढ़ने का है। सब काम करेंगे तो प्रदेश में विकास बोलेगा ही नहीं, दिखेगा भी। 

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