गुना। भारतीय चिकित्सा पद्धति के विशेषज्ञों ने त्वचा की बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए जड़ी-बूटियों का उपयोग करने वाली पद्धतियों को वैज्ञानिक शोधों में सही पाया है। इन पद्धतियों का उपयोग अमीर-गरीब में बहुतायत से किया जाता है। यह इलाज ज्यादा खर्चीला नहीं है।

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जिला अस्पताल गुना में कार्यरत आयुष विंग के चिकित्सा अधिकारी डॉ. अंकेश अग्रवाल (एमडी आयुर्वेद) का कहना है कि त्वचा रोग के कई प्रभावी उपचार आज उपलब्ध हैं। लेकिन सबसे अधिक सरल,कम खर्चीला और प्रभावकारी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति है।

इस पद्धति से इलाज की सफलता की दर काफी अच्छी है। डॉ. अग्रवाल कहते हैं कि त्वचा हमारे शरीर का आईना है। स्वस्थ व सुन्दर त्वचा हमारे शरीर का निर्धारण करती है। इसके साथ ही त्वचा क्षेत्रफल के हिसाब से शरीर का सबसे बड़ा अंग है। लेकिन कई बार लोग त्वचा रोगों को गंभीरता से नहीं लेते और जब वे इलाज के लिए आते हैं, तब तक समस्या बढ़ चुकी होती है।

डॉ.अग्रवाल ने आयुष विंग में वर्ष 2017 में आए मरीजों की स्थिति के बारे में पूछने पर बताया कि कुल रोगियों में से त्वचा रोग की चपेट में आने वाले लोगों की तादाद दस फीसद है। इनमें दाद, एक्सिमा, एलर्जिक, डर्मेटाइटिस, कॉन्टेक्ट डर्मेटाइटिस, सोरायसिस, हाथ पैरों की त्वचा का फटना, विभिन्न प्रकार के फंगल इंफेक्शन के रोगी शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि यह रोग लम्बे समय तक बना रहने वाला रोग है और इस का इलाज भी लम्बे समय तक चलता है। दाद, फंगल इंफेक्शन जैसी बीमारियां वर्षा ऋतु में नमी बढऩे से ज्यादा होती हैं। सर्दियों में हवा में शुष्कता बढऩे से सोरायसिस, शीतपित्त(अर्टिकेरिया), हाथ-पैरों की त्वचा का फटना आदि बीमारियां अधिक होती हैं। ग्रीष्म ऋतु में पसीना अधिक होने से घमोरियां आदि बढ़ जाती हैं।

डॉ.अग्रवाल का मानना है कि आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी, बढ़ता हुआ मानसिक तनाव आदि समस्याओं की वजह से हम अपने खानपान एवं दिनचर्या का उचित ख्याल नहीं रख पाते हैं और त्वचा रोगों की गिरफ्त में आ जाते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों में त्वचा रोगों के बारे में और जागरूकता फैलाने की जरूरत है।

डॉ.अग्रवाल कहते हैं कि विपरीत ढंग से खानपान जैसे गर्म एवं ठंडी वस्तुओं का एक साथ सेवन, मछली, उड़द, तिल, दूध, दही, तले हुए एवं खट्टे पदार्थों, मेंदा, बेसन आदि पदार्थों का अधिक सेवन, मल-मूत्र के वेगों को रोकना, पंचकर्म का गलत ढंग से प्रयोग, दिन में सोना एवं रात्रि में जागना, साफ-सफाई से न रहना, संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आना आदि से यह बीमारियां होती हैं।

डॉ.अग्रवाल कहते हैं कि करेला, परवल आदि का खान-पान में प्रयोग करना चाहिए, मूंग की दाल का पानी पीना चाहिए। मुख्य रूप से इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कब्ज ना हो, क्योंकि कब्ज होने से त्वचा रोग बढ़ जाते हैं। कुछ घरेलू औषधियों जैसे हल्दी, नीम, आँवला, हरड़, कत्था आदि का सेवन करना चाहिए एवं बाह्य प्रयोग में सुहागा, फिटकरी, चमेली के पत्तो, पवाड़ के बीज एवं पतो, नीम की छाल, पीपल की छाल, बरगद की छाल को घिसकर लेप लगाना प्रभावी है।

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आरोग्यवर्धिनी वटी, कैशोर गुग्गल, गंधक रसायन, खदिरारिष्ट, महामंजिस्ठादि क्वाथ, शु.टंकन, स्फटिका भस्म, सर्जरस मलहर आदि आयुर्वेदिक दवाओं से त्वचा रोग का सफल इलाज होता है। जीर्ण त्वचा रोगों में औषधियों के साथ-साथ पंचकर्म भी आवश्यक होता है। त्वचा रोगों में वमन-विरेचन एवं रक्तमोदाम द्वारा बार-बार शरीर की शुद्धि हो जाने पर त्वचा रोगों में अभूतपूर्व लाभ होता है।

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