छठ पर्व का प्रथम दिन नहाय-खाय से शुरू होता है। नहाय-खाय मंगलवार को है। सूर्योदय 6:22 बजे और पंचमी तिथि का मान संपूर्ण दिन व रात है। छठ व्रत का दूसरा दिन खरना 25 को है। इस दिन सूर्योदय 6:23 बजे और पंचमी तिथि प्रातः 7:09 बजे तक है। इसके बाद षष्ठी शुरू होगी। मंगलवार को सारा बाजार सामानों से पटा हुआ था। पूरे दिन लोगों ने जमकर खरीददारी किया।

सायंकालीन अर्घ्यः- छठ पर्व के तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पूर्ण उपवास होता है। यह व्रत 26 अक्टूबर को है। इस दिन सूर्योदय 6:24 बजे और षष्ठी तिथि सुबह 9:17 बजे तक है। इसके बाद सप्तमी लग जाएगी। अस्ताचलगामी सूर्य के अर्घ्य का समय सायं 5:36 बजे है।

छठ पूजा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी,पवित्रता, भक्ति एवं अध्यात्म है। इसकी उपासना पद्धति सरल है। इसमें किसी आचार्य की आवश्यकता नहीं है। यह लौकिक रीति-रिवाज एवं ग्रामीण जीवन पर आधारित है।

ज्योतिषाचार्य पं. सदानन्द मिश्र के मुताबिक हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में शामिल छठ पर्व पर भगवान भास्कर की आराधना की जाती है। छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है।

पांडव जब वनवास काट रहे थे तो द्रौपदी ने कुल पुरोहित की आज्ञा प्राप्त होने पर युधिष्ठिर के साथ छठ व्रत-पूजन किया था। सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर युधिष्ठिर को अद्भुत ताम्रपात्र प्रदान किया। जिसमें मधुर, स्वादिष्ट भोजन हमेशा उपलब्ध रहता था। द्रौपदी के व्रत-पूजन से प्रसन्न होकर सूर्य भगवान “छठ माता”ने युधिष्ठिर को राज-पाठ, धन-दौलत,वैभव, मान-सम्मान,यश-कीर्ति पुनरू प्रदान किया।

पं. मिश्र के अनुसार ब्रह्मावैवर्त पुराण में षष्ठी देवी के महात्म्य पूजन विधि एवं पृथ्वी पर इनके पूजा प्रसाद इत्यादि के विषय में चर्चा की गई है । किंतु सूर्य के साथ षष्ठी देवी के पूजन का विधान तथा सूर्यषष्ठी नाम के व्रत की चर्चा नहीं की गई है। इस विषय में भविष्य पुराण में प्रतिमास के तिथि व्रतों के साथ षष्ठीव्रत का उल्लेख स्कंद षष्ठी के नाम से किया गया है। परंतु इस व्रत के विधान और सूर्यषष्ठी व्रत के विधान में पर्याप्त अंतर है।

मैथिलि ग्रंथ वर्षकृत्यविधि में प्रतिहार षष्ठी के नाम से बिहार में प्रसिद्ध सूर्यषष्ठी की चर्चा की गई है। इस ग्रंथ में व्रत पूजा की पूरी विधि कथा तथा फलश्रुति के साथ तिथियों के क्षय एवं वृद्धि की दशा में कौन सी तिथि ग्राह्य है। इस विषय पर भी धर्मशास्त्रीय दृष्टि से सांगोपांग चर्चा हुई है और अनेक प्रामाणिक स्मृति ग्रंथों से प्रमाण भी दिए गए हैं।

कथा के अंत में इति श्री स्कंद पुराणोक्त प्रतिहार षष्ठी व्रत कथा समाप्ता लिखा है। इससे ज्ञात होता है कि स्कंद पुराण के किसी संस्करण में इस व्रत का उल्लेख अवश्य हुआ होगा। इससे इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता भी परिलक्षित होती है। प्रतिहार का अर्थ है. जादू या चमत्कार अर्थात चमत्कारिक रूप से अभीष्ट को प्रदान करने वाला व्रत।

इस ग्रंथ में षष्ठी व्रत की कथा अन्य पौराणिक कथाओं की तरह वर्णित है। यहा भी नैमिषारण्य में शौनकादि मुनियों के पूछने पर श्रीसूत लोक कल्याणार्थ सूर्यषष्ठी व्रत के महात्म्य विधि तथा कथा का उपदेश करते हैं।

प्रातः कालीन अर्घ्य षष्ठी व्रत की पूर्णाहुति चतुर्थ दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ होती है। 27 अक्टूबर को प्रातः कालीन अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सूर्योदय 6:24 बजे है।इसी समय प्रातः कालीन अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन सप्तमी तिथि प्रातः 11:14 बजे तक है। अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाएं पारण करेंगी।

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