भगवान शिव आदिदेव हैं। ब्रह्मा और विष्णु को उत्पन्न करने वाले हैं। स्वर, व्यंजन, मात्रा और बिंदु के प्रथम प्रकाशक हैं। धरती की उत्पत्ति भी उन्होंने ही की है। जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच खुद को उत्पन्न करने वाले को लेकर विवाद होता है तो भगवान शिव परम तेजोमय ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होते हैं। दोनों ज्योतिर्लिंग का रहस्य जानने का प्रयास करते हैं लेकिन असफल रहते हैं। तब ओम का निनाद होता है लेकिन उनकी परेशानी कम नहीं होती। अंत में भगवान शिव ब्रह्मा और विष्णु को सृष्टि के निर्माण और पालन का आदेश देते हैं। रूद्र रूप में संहार का दायित्व वे खुद संभालते हैं।

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जिस दिन सर्वप्रथम दिव्य ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ था, उस दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी थी। सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन हुआ था। स्वर, व्यंजन, अक्षर का जन्म भी उसी दिन हुआ था। शिवमहापुराण में कथा मिलती है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह माता पार्वती के साथ हुआ था। इस दिन भगवान शिव की आराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होता है।

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ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को शिवलिंग के पूजन की महिमा बताई थी। नारद ने जिज्ञासावश कुछ सवाल किए थे और ब्रह्माजी ने उनकी जिज्ञासा का समाधान किया था। पूरा शिव महापुराण इसी पर आधारित है। माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने सौ करोड़ श्लोकों वाले शिव महापुराण की रचना की थी। बाद में भगवान शिव की आज्ञा से वेदव्यास ने उसका 24672 श्लोकों में संक्षिप्तीकरण किया।

भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत विकट है। ‘विकट वेष मुख पंच पुरारी।’ उनके विकट वेष का रहस्य भी उतना ही विलक्षण है। भगवान शिव की जटाएं, अंतरिक्ष और चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है। शिव की तीन आंखें हैं। ये आंखें तीनों गुणों सत्व, रज और तम की द्योतक हैं। तीनों कालों भूत, वर्तमान और भविष्य की प्रतीक हैं। स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताल लोक की परिचायक हैं। इसका मतलब है कि शिवतत्व ही संसार के मूल में है। शिव संहार के देवता हैं। सर्प मृत्यु का प्रतीक है, जो उनके गले का हार है। ‘तनौ मुंडमालं गले सर्पजालं।’ सर्प तमोगुणी है, जो शिव का वशवर्ती है। शिव के हाथ में एक शस्त्र है त्रिशूल, जो दैहिक, दैविक और भौतिक तापों को नष्ट करता है। शिव का डमरू नाद ब्रह्म का स्वरूप है। इसी से वे पाणिनी ऋषि को व्याकरण के 14 सूत्र प्रदान करते हैं।

शिव के गले में मुंडमाला है, जो सांसारिक नश्वरता का बोध कराती है। शिव द्वारा पहना गया व्याघ्र चर्म हिंसा और अहंकार के दमन का प्रतीक है। शिव के शरीर पर भस्म का लेप बताता है कि ये संसार नाशवान है। मिथ्या दंभ पालने की जरूरत नहीं है। भगवान शिव का वाहन नंदी बैल है, जो धर्म का प्रतीक है। उसके चार पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का बोध कराते हैं। मतलब साफ है कि शिवकृपा से ही पुरुषार्थ चतुष्ट्य की प्राप्ति होती है। शिव-स्वरूप यह बताने के लिए काफी है कि उनमें ही सारी सृष्टि समाहित है। शिव का अर्थ होता है कल्याण। भगवान शिव कल्याण के देवता हैं। हिंदू देवी-देवताओं में भोलेनाथ सबसे लोकप्रिय हैं। सुर, नर, असुर, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नाग और सिद्ध ही नहीं, चराचर जगत उनकी आराधना करता है।

ऐसी मान्यता है कि अगर सच्चे हृदय से भगवान शिव की पूजा की जाए तो वे शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। वे तो केवल जलाभिषेक, बिल्वपत्र चढ़ाने और रात्रि भर जागने से ही प्रसन्न हो जाते हैं। महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे प्रिय दिन है। यह आत्मा को पुनीत करता है। इस व्रत से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जीवों के प्रति दया-भाव उपजता है। महाशिवरात्रि को दिन-रात पूजा का विधान है। चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है। चार पहर रात्रि में वेदमंत्र संहिता, रुद्राष्टाध्यायी का पाठ ब्राह्मणों के मुख से सुनना चाहिए। सूर्योदय के वक्त पुष्पांजलि और स्तुति कीर्तन करना चाहिए।

अधिकांश हिंदू पर्व शिव-पार्वती को समर्पित हैं। शिव औघड़दानी हैं और सहज कृपा करना उनका स्वभाव है। महाशिवरात्रि के सिद्ध मुहूर्त में शिवलिंग को प्राण प्रतिष्ठित करवाकर स्थापित करने से व्यवसाय में वृद्धि और नौकरी में तरक्की मिलती है। शिवरात्रि के प्रदोष काल में स्फटिक शिवलिंग को शुद्ध गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराने, धूप-दीप जलाकर पंचाक्षर मंत्र का जप करने से समस्त बाधाओं का शमन होता है। बीमारी से निजात पाने और प्राणों की रक्षा के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। इस दिन व्रत कर रात्रि में पांच बार शिवजी के दर्शन-पूजन-वंदन से व्यक्ति की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवलिंग पर जल अथवा दूध चढ़ाने से भगवान प्रसन्न होते हैं। शिवरात्रि को रूद्राष्टक स्तोत्र का पाठ करने से शत्रुओं से मुक्ति मिलती है।

ज्योतिषियों की मानें तो चतुर्दशी को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से है। मन कमजोर हो तो भौतिक संताप तथा विषाद की स्थिति बनती है। शिवरात्रि की साधना से भोले बाबा के साथ चंद्रदेव की भी कृपा मिलती है। शिव सृष्टि के विनाश और पुनर्स्थापन के बीच की कड़ी हैं। तंत्र साधक उनके भैरव स्वरूप की आराधना करते हैं। वेद में उन्हें रुद्र कहा गया है। वे चेतना के स्वामी हैं। वेद ही शिव हैं और शिव ही वेद हैं। ‘वेदो शिवम शिवो वेदम।’ भगवान शंकर अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ हैं फिर भी श्मशानवासी और वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष हैं लेकिन भयंकर रुद्र भी हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी में समभाव है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।

शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल और गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजित होकर अपनी कांति से जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण भूमि तथा परम कल्याणमय हैं। समस्त विद्याओं के मूल स्थान हैं। ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया शक्ति में शिव सरीखा कोई नहीं है। वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा उन्हें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और ज्ञान देते हैं।

शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं। भगवान शंकर ज्ञान, वैराग्य तथा साधुता के परमादर्श हैं। वह भयंकर रुद्ररूप हैं तो भोलेनाथ भी हैं। अन्य सभी देवता समुद्र मंथन से निकले हुए लक्ष्मी, कामधेनु, कल्पवृक्ष और अमृत ले गए, लेकिन शिवजी ने हलाहल पान कर संसार की रक्षा की। भगवान शंकर एक पत्नीव्रत के अनुपम आदर्श हैं। संगीत और नृत्य कला के आदि आचार्य हैं। उनके डमरू से ही सात स्वरों का जन्म हुआ है। ऐसे शिव की आराधना से किसका भला नहीं होगा?

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