गोरखपुर। भगवान राम और उनसे जुड़े संस्मरण विभिन्न समय, काल और स्थान से जुड़ा है। एक ऐसा ही स्थान कुशीनगर का बांसी है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान राम ने जनकपुर से विवाह बंधन में बंधकर लौटते समय यहां रात्रि विश्राम किया था। बारातियों ने बाँसी नदी में तट पर विश्राम करने के बाद खुद को तर-ओ-ताजा किया था। तब से इस स्थान का महत्व चला आ रहा है।

पवित्र बांसी नदी में कार्तिक पूर्णिमा के स्नान दान करने का काफी महत्व है। पौराणिक कथाओं के।मुताबिक उत्तर प्रदेश-बिहार राज्य की सीमा पर स्थित कुशीनगर जिले के जंगल सिंघापट्टी गांव से होकर गुजरने वाली बांसी नदी के किनारे भगवान राम ने सीता और बारातियों संग रात बिताई थी।

कथा के मुताबिक भगवाण राम ने त्रेता युग में जनकपुर में माता सीता से विवाह के बाद अयोध्या के लिके रुख किया था। बाँसी पहुंचते-पहुंचते दिन ढलने लगा था। देवरण्य क्षेत्र में रूप में प्रसिद्ध यह जगह जंगलों से घिरा था और जंगली जानवरों का बसेरा था। बे खुले रूप से विचरण करते थे। इस वजह से भवन राम की बारात से लौटने वालों की सुरक्षा में वजह से बारात यहीं रुक गयी। रात्रि विश्राम किया। सुबह बाँसी स्नान कर तर-ओ-ताजा होने के बाद पुनः आगे का सफर तय किया था। अब यह एक तीर्थस्थल के रूप में विख्यात है।

भगवान राम ने स्थापित किया था शिवलिंग

सुबह नित्य क्रिया के बाद स्नान कर शरीर को पवित्र कर भगवान शिव की प्रति दिन आराधना करने वाले भगवान राम ने यहां एक शिव लिंग की पिंडी बनाकर पूजा की थी। घने जंगल मे स्थापित इस पिंडी के बारे में जानने वाले स्थानीय लोगों ने यहां पूजन-अर्चन शुरू कर दी थी। कालांतर में यहां एक शिव मंदिर स्थापित किया गया। अब यहां आने वाला हर श्रद्धालु बांसीघाट स्थित इस शिव मंदिर में पूजन-अर्चन किये बगैर नहीं लौटता।

प्रचलित है कहावत

भगवान राम और भगवान शिव एक-दूसरे के अनन्य भक्त मने जाते हैं। बाँसी।में भगवान राम द्वारा भगवान शंकर की पिंडी स्थापित करने के बाद इस स्थान एक महत्व और भी बढ़ गया। धीरे-धीरे इस स्थान में बारे में एक कहावत ”सौ काशी न एक बाँसी” प्रचलित हो गयी। अर्थात काशी में सौ बार स्नान करने के बराबर बांसी में एक बार स्नान करने से ही पुण्य प्राप्त होता है।

रामघाट नाम से प्रसिद्ध है विश्राम स्थल

बांसी धाम से एक किलोमीटर पश्चिम की ओर बांसी नदी के किनारे रामघाट स्थित है। कहते हैं यही भगवान राम के रुकने का स्थान था। यहां एक राउटी डालकर भगवान ने रात बिताई थी।

पूर्वांचल और नेपाल में आते हैं श्रद्धालु

रामजानकी मंदिर के महंत गोपाल दास की मानें तो यहां आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने व भोजन के लिए भंडारा चलता है। आने वाले श्रद्धालुओं में कुशीनगर, महाराजगंज, गोरखपुर, बिहार के पश्चिमी चंपारण व नेपाल के शामिल रहते हैं।

यहां नहीं आतीं हैं गायों की बछिया

भले ही योगी सरकार में आने के बाद गौ सेवकों के हौसला बढ़ा है और वे गायों की सुरक्षा के प्रति ज्यादा सतर्क हुए हैं। लेकिन यहां बहुत पहले से ही गायों की बछिया लेन पर प्रतिबंध जैसा है। यह प्रतिबंध जैसी स्थिति प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं हुई है, बल्कि बांसीघाट के पांडाओं ने बछिया लेन वाले श्रद्धालुओं को यहां आने से मना कर दिया। इनका मानना था कि केवल संकल्प मात्र से हम लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए गायों और उनकी बछियों को परेशान करना पुण्य की बजाय पाप की वजह बनती हैं।

यह भी जानें

उपवास से मिलता है एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ के बराबर फल
कार्तिक पूर्णिमा बहुत ही पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान और दान से सभी जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। इस दिन विधि-विधान से पूजा अर्चना करना ना केवल पवित्र है, बल्कि इससे समृद्धि भी आती है। कष्ट दूर होते हैं। वैदिक मान्यता के मुताबिक इस दिन पूजा करने से कुंडली धन और शनि के दोष दूर होते हैं। तीर्थस्थलों पर यह बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। श्रद्धालु नदियों में स्नान कर दीप दान करते हैं। इलाहाबाद, वाराणसी, अयोध्या जैसे तीर्थस्थलों पर श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है। वैदिक मान्यता के अनुसार इस दिन उपवास करने से एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है।

इसी दिन भगवान शंकर ने किया था त्रिपुर का वध

इस दिन का जुड़ाव भगवान शंकर से है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान शिव ने इसी दिन त्रिपुर नामक राक्षस का वध किया था। त्रिपुर ने एक लाख वर्ष तक प्रयाग में भारी तपस्या कर ब्रह्मा से मनुष्य और देवताओं के हाथों ना मारे जाने का वरदान हासिल किया था।

ऐसे करें आराधना

-प्रातः काल शीघ्र उठकर सूर्य देव को जल अर्पित करें। जल में चावल और लाल फूल भी डालें।
-सुबह स्नान के बाद घर के मुख्यद्वार पर अपने हाथों से आम के पत्तों का तोरण बनाकर बांधे।
-सरसों का तेल, तिल, काले वस्त्र आदि किसी जरूरतमंद को दान करें।
-सायंकाल में तुलसी के पास दीपक जलाएं और उनकी परिक्रमा करें।
– ब्राह्मण के साथ ही अपनी बहन, बहन के लड़के, यानी भान्जे, बुआ के बेटे, मामा को भी कोई सामान दान करें।
-चंद्रोदय के समय छः कृतिकाओं शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा का पूजन करें। इससे भगवान शिव का आशीर्वाद मिलता है।

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