सियाराम पांडेय ‘शांत’

कार्तिक पूर्णिमा ऐसा पर्व है जो हिंदुओं और सिखों की आस्था का प्रतीक है। यह पर्व भगवान विष्णु और भगवान शिव से जुड़ा है। यह पर्व शिवपुत्र स्वामी कार्तिकेय से भी जुड़ा है। छह कृतिकाओं ने अपना दूध पिलाकर स्वामी कार्तिकेय के जीवन की रक्षा की थी। इस तिथि को ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अंगिरा और आदित्य आदि का दिन भी माना जाता है। मतलब इस तिथि को की जाने वाली आराधना से कई देवता एक साथ प्रसन्न होते हैं। ‘एकै साधै-सब सधै।’ कार्तिक पूर्णिमा के दिन भारत की लगभग एक चैथाई आबादी नदियों एवं तालाबों में स्नान-दान करती है। भारतवासी हरिद्वार, काशी, गढ़मुक्तेश्वर, पुष्कर आदि तीर्थों में स्नान कर अपनी जातीय और सांस्कृतिक एकता का परिचय देते हैं। भारत के समस्त सनातनधर्मियों के लिए देश के विभिन्न भूभाग में बने तीर्थ भारत के मात के पवित्र अवयव हैं और वे समान रूप से वंदनीय भी हैं।

भारत पर्व-त्यौहारों का देश है। वह एक उत्सवधर्मी समाज है। यह त्याग-तपस्या का देश है। सहयोग और सहकार का देश है। यहां हर पर्व मनाने के, हर व्रत करने के अपने ठोस कारण हैं। ऐसे कारण जिन पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती। यहां व्रत और त्यौहारों का केवल धार्मिक आध्यात्मिक महत्व ही नहीं है। वे भारत की अर्थ व्यवस्था, मनोविज्ञान और स्वास्थ्य लाभ से भी गहरे जुड़े हैं। कार्तिक पूर्णिमा ऐसे ही त्यौहारों में एक है। कार्तिक पूर्णिमा एक ऐसा त्यौहार है जिसे शैव भी उतना ही मानते हैं जितना कि वैष्णव। सिखों के लिए भी यह पर्व अत्यंत वरेण्य है। आयुर्वेद ग्रंथों में कार्तिक स्नान का महत्व इस श्लोक से पता चलता है। ‘कार्तिकस्यदिनान्यस्टावग्रहणस्य च। यमदं्रष्टा समाख्याता अल्पाहारः स जीवति।’

अर्थात कार्तिक महीने के अंतिम आठ और मार्गशीर्ष माह के पहले आठ दिन सब मिलकर 16 दिन यमद्रंष्टा अर्थात मृत्यु के जबड़े के नाम से विख्यात हैं। इनमें जो अल्पाहार करके संयत जीवन बिताएगा, वही दीर्घायु होगा। ज्योतिष ग्रंथों पर यकीन करें तो तुला का सूर्य नीच का होता है। दशांश में वह परम नीच का हो जाता है। उक्त परम नीच का अवसर इन मृत्यु का जबड़ा कहलाने वाले दिनों में ही आता है।इन दिनों में जठराग्नि का मंद पड़ना आम समस्या है।

इसीलिए भारतीय मनीषियों ने कार्तिक मेलों की शुरुआत की थी जिससे लोगों को स्वच्छ वातावरण में संयत जीवन बिताने का अवसर मिल सके। कहना न होगा कि वह परंपरा आज तक बदस्तूर चली आ रही है। इसका लाभ आस्तिक हिंदुओं को ही नहीं, मेला देखने आए नास्तिकों को भी मिल जाता है। गैर हिंदू जो छोटी-मोटी दुकानदारी के चक्कर में इन मेलों में पहुंचते हैं, वे भी प्रकारांतर से नदी और तालाब में स्नान और स्वच्छ जलवायु से मिलने वाले स्वास्थ्य का लाभ हासिल कर लेते हैं।

आज ही के दिन भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार ग्रहण किया था। ऐसी मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। फिर वे कार्तिक शुक्ल एकादशी को उठते हैं और पूर्णिमा से वे कार्यरत हो जाते हैं। शायद यही वजह है कि दीपावली को लक्ष्मीजी का पूजन बिना विष्णुजी के किया जाता है। गणेश जी के साथ लक्ष्मी जी की पूजा होती है। शिवभक्तों के लिए यह तिथि इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि इसी तिथि को त्रिपुरासुर का वध कर भगवान शिव ने संसार के भय और कष्ट दूर किया था। त्रिपुरासुर का वध करने की वजह से ही भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा कहने के पीछे त्रिपुरासुर के वध को स्मृति दिवस के रूप में मनाना और इसी बहाने भगवान शिव का गुणानुवाद करना भी है। इस तिथि में भगवान शिव का पूजन करने से साधक को सात जन्मों तक ज्ञान और धन की प्राप्ति होती है। जीवन का अंत होने पर वह शिवसायुज्य गति को प्राप्त करता है। इस दिन चंद्रोदय के वक्त शिवा, संभूति, संतति, प्रीति, अनुसूया और क्षमा इन छह कृतिकाओं का पूजन करने से भूतभावन शंकर अत्यंत प्रसन्न होते और ऐसा करने वालों पर अहैतुकी कृपा करते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्नान और दान का विशेष महत्व है। इस दिन किए गए अन्न, धन व वस्त्र आदि के दान का कई गुना पुण्य प्राप्त होता है। कहते हैं कि कार्तिक पूर्णिमा को किया गया दान मृत्यु के उपरांत जीव को स्वर्ग में प्राप्त होता है। कार्तिक पूर्णिमा सभी सुखों व ऐश्वर्यों को देने वाली है। इस दिन की गई पूजा और व्रत के प्रताप से साधक ईश्वर के और करीब पहुंच जाते हैं। इस दिन भगवान अगर सत्यनारायण की पूजा की जाए तो इससे पूजा करने वाले को सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। भगवान शिव के अभिषेक से स्वास्थ्य उत्तम होता है और आयु में वृद्धि होती है।

शिवलिंग के पास दीपदान से भय से मुक्ति मिलती है। इस दिन अगर सूर्य की आराधना की जाए तो उससे लोकप्रियता और मान सम्मान दोनों मिलता है। विनाशकारी महाभारत युद्ध में युद्ध में मारे गए योद्धाओं और सगे-संबंधियों को देखकर जब पांडव विचलित हो गए तो भगवान श्रीकृष्ण उन्हें लेकर गढ़ खादर के विशाल रेतीले मैदान पर आए। कार्तिक शुक्ल अष्टमी को पांडवों ने यहां गंगा स्नान किया और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तक वहां यज्ञ किया। इसके बाद रात में दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दीपदान करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। इसलिए इस दिन गंगा स्नान का और विशेष रूप से गढ़मुक्तेश्वर में आकर स्नान करने का विशेष महत्व है।

शास्त्रों की मानें तो कार्तिक पुर्णिमा को पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। कार्तिक माह की पूर्णिमा तिथि पर व्यक्ति को बिना स्नान किए नहीं रहना चाहिए। पूर्णिमा तिथि को हिन्दू धर्म में अत्यंत शुभ और फलदायी बताया गया है। भविष्यपुराण के अनुसार वैशाख, माघ और कार्तिक माह की पूर्णिमा स्नान-दान के लिए अति श्रेष्ठ होती हैं। मान्यता यह भी है कि इस दिन पूरे दिन व्रत रखकर रात्रि में बछड़ा दान करने से शिवपद मिलता है।

जो व्यक्ति इस दिन उपवास कर भगवान शिव का गुणगान करता है उसे अग्निष्टोमयज्ञ का फल प्राप्त होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीप दान, हवन, यज्ञ आदि करने से सांसारिक पाप और दैहिक, दैविक-भौतिक ताप नष्ट होते हैं। सिख संप्रदाय में कार्तिक पूर्णिमा का दिन प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन सिख संप्रदाय के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था। नानकदेव सिखों के पहले गुरु हैं। इस दिन सिख संप्रदाय के अनुयायी सुबह गुरुद्वारे जाकर गुरुवाणी सुनते हैं। इसे गुरु पर्व भी कहा जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा को महीने भर तारों की छाया में नहाने, भगवान के नाम का जप करने वाले और स्नान-दान करने वालों का व्रत पूर्ण होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से भी पूरे वर्ष स्नान करने का फल मिलता है। कार्तिक माह में प्रातः नदी और तीर्थ सरोवरों में स्नान के बहाने लोगों का प्रातः जागरण और भ्रमण भी हो जाता है, यह उनके स्वास्थ्य के लिए कितना उपकारक होता है, यह किसी से छिपा नहीं है।

प्रातःकाल नदी और सरोवर में स्नान करने से शरीर में दिन भर स्फूर्ति बनी रहती है, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। देखा यह जाता है कि जाड़े के दिनों में बहुत सारे लोग ठंड के डर से महीनों स्नान ही नहीं करते। ऐसे में वे कई तरह के त्वचा और रक्तविकार की चपेट में आ जाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में जल शीतल नहीं, उष्ण होता है। अतः ठंड नहीं लगती। जो लोग इस बात को जानते हैं वे निरंतर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करते और स्वस्थ रहते हैं। कार्तिक प्रातः स्नान के लिए ही नहीं, मेलों के लिए भी जाना जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस महीने में नदी और तीर्थ सरोवरों के किनारे बड़े मेले लगते और धार्मिक आयोजन होते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन नदी में स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा-आरती करनी चाहिए। इस दिन मात्र एक समय भोजन करना चाहिए और यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिए। शाम के समय चन्द्रमा को अघ्र्य देना चाहिए। कार्तिक पूर्णिमा ऐसी पवित्र तिथि है जिसमें एक साथ सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न किया जा सकता है। पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी को अत्यन्त प्रिय है। इस रात मां लक्ष्मी की आराधना करने से जीवन में खुशियों की बहार आती है। पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी का पीपल के वृक्ष पर निवास रहता है।

पूर्णिमा के दिन जो भी साधक मीठे जल में दूध मिलाकर पीपल के पेड़ पर चढ़ाता है, उस पर मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है। कार्तिक पूर्णिमा को गरीबों को चावल दान करने से चन्द्र ग्रह शुभ फल देता है। इसी तरह शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद व गंगाजल मिला कर चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को भूलकर भी पत्नी या प्रेयसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए। इससे चन्द्रमा के प्रतिकूल होने का खतरा उत्पन्न होता है और जीवन की शांति छिन जाती है। इस दिन पत्नी या किसी नन्ही बच्ची को उपहार देने से चंद्र अनुकूल हो जाते हैं और शुभ फल देने लगते हैं। पूर्णिमा पर चन्द्रमा के उदय होने के पश्चात खीर में मिश्री व गंगा जल मिलाकर मां लक्ष्मी को भोग लगाएं। द्वार पर रंगोली बनाएं। इससे विशेष समृद्धि के योग बनते हैं। नवग्रह प्रसन्न होते हैं।

कृतिका नक्षत्र होने पर कार्तिक पूर्णिमा महाकार्तिकी में तब्दील हो जाती है तथा भरणी नक्षत्र होने पर वह विशेष रूप से फलदायी हो जाती है। देवालयों में दीपक जलाने का विशेष फल मिलता है। सायंकाल देवालयों, मंदिरों, चैराहों और पीपल व तुलसी वृक्ष के सम्मुख दीपक जलाने का प्रावधान है। कार्तिक पूर्णिमा पर चूंकि जलाशय में स्नान का विशेष महत्व है तो इस दिन नदियों किनारे बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्र होकर स्नान करते हैं और श्री हरि का स्मरण करते हैं। कार्तिक पुण्य मास है। इस महीने में भगवान विष्णु जल के अंदर निवास करते हैं। इसलिए नदियों एवं तालाब में स्नान करने से भगवान विष्णु की पूजा का पुण्य प्राप्त होता है।

आज ही के दिन मां तुलसी का स्वर्ग में अवतरण हुआ था। तुलसी की प्रतिदिन पूजन करने से घर में धन-संपदा, वैभव, सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। प्रतिदिन मां तुलसी से मनोकामना कही जाए तो वह भी निश्चित रूप से पूर्ण होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है। देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः। नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये। इस मंत्र का उच्चारण करते हुए अगर तुलसी की प्रार्थना की जाए तो व्यक्ति की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहती। कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान-दान, देवालयों और पीपल के नीचे दीप जलाने से भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं। भगवान शिव, पार्वती और स्वामी कार्तिकेय प्रसन्न होते हैं। भगवान सूर्य और चंद्रमा प्रसन्न होते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को जल देने से सूर्य का तेज बढ़ता है। व्यक्ति अगर अपना सर्वतोमुखी कल्याण चाहता है तो उसे कार्तिक व्रत जरूर करना चाहिए। यह एक तिथि ही सब तिथियों पर भारी है।

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