जगदलपुर। वर्षा काल में देवताओं के शयन में रहने के कारण शुभ कार्य या मांगलिक कार्य नहीं होते लेकिन इस माह के अंतिम दिन यानि मंगलवार को (कल) देव उठनी एकादशी का महत्वपूर्ण दिन है, जिससे मांगलिक कार्यों में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी और कार्य संपन्न होने लगेंगे।

पंडितों एवं ज्योतिषविदों के अनुसार 31 अक्टूबर को देवउठनी एकादशी के साथ तुलसी विवाह का कार्यक्रम भी संपन्न होगा। उनके अनुसार शुभ कार्य केे लिए आवश्यक शुक्र का जागृत रहना भी आवश्यक है लेकिन उनके अस्त होने से विवाह के मुहूर्त आगामी 19 नवंबर से शुरू होंगे। तुलसी विवाह के बारे में बताते हुए पंडितों ने कहा है कि कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन तुलसी विवाह की परंपरा चलती आ रही है।

पुरानों के अनुसार तुलसी को पूर्व में जलंधर दैत्य की पत्नी बताया गया है। जलंधर के द्वारा अत्याचार करने से भगवान विष्णु ने अपने योग से उसका वध किया था। पति के ना रहने से व्याकुल तुलसी सती हो गई थी। सती हो जाने के उपरांत उसकी भस्म जो निर्मित हुई उससे तुलसी पौधे का जन्म हुआ। तुलसी की पतिव्रता एवं उसके द्वारा किए गए तप के कारण भगवान विष्णु ने शालीग्राम के रूप में आकर उससे विवाह किया।

इसीलिए तुलसी को अत्यंत पवित्र पौधा माना जाता है और उसे घरों के आंगन में स्थान दिया जाता है। इसके बाद से ही तुलसी विवाह की परंपरा शुरू हुई और तुलसी विवाह के पश्चात शुभ एवं मंगलकारी कार्यों का आरंभ हो जाता है। भक्तिभाव पूर्वक प्रतिवर्ष लोग देवताओं के उठने का पर्व के रूप में आनंदोत्सव मनाते हैं। यह भी एक दुर्लभ संयोग है कि अंग्रेजी माह के अक्टूबर में ही देव उठनी एकादशी का आगमन हुआ है और यह आगमन पंडितों के अनुसार 100 वर्षों के पश्चात हो रहा है। 

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